उत्तराखंड : कैसे पटरी से उतरी विकास की गाड़ी? 500 करोड़ में से 490 करोड़ रहे बेकार!

देहरादून. राज्य में विकास के नाम का अरबों रुपया विभागों की कैद से रिलीज ही नहीं किया गया! जी हां, ज़िलाधिकारियों के पास पांच सौ करोड़ रुपये की वो राशि बेकार पड़ी रही, जिसे ज़िला प्लान के तहत अप्रैल और मई में रिलीज़ किया जाना था ताकि विकास कार्य हो सकें. लेकिन सुस्त गति कहें या अनदेखी, इसे जारी करने की ज़हमत विभागों ने नहीं उठाई तो बड़े पैमाने पर विकास कार्य प्रभावित हुए. सड़क से लेकर स्वास्थ्य सुविधाओं तक के लिए छोटे बड़े डेवलपमेंट के लिए ज़िला प्लान के अंतर्गत यह पैसा रिलीज़ होता है, जिसका इस्तेमाल ही नहीं किया जा सका.

स्टेट प्लान की तरह ज़िलों में जिला प्लान वर्क करता है. इस साल प्रदेश के सभी ज़िलों के लिए 700 करोड़ रुपए का प्लान स्वीकृत किया गया था. वित्तीय वर्ष की शुरुआत में ही प्रथम किस्त के रूप में इसमें से पांच सौ करोड़ रुपये ज़िलों को रिलीज़ कर दिए गए थे. वो भी कोरोना और मानसून से पहले के समय में गांवों में सड़क, बिजली, पानी, पुल, पैदल रास्तों जैसे कामों को अंजाम दिया जाना चाहिए था, लेकिन कई ज़िले इस राशि से विकास कार्य करवाने में पिछड़ गए.

किस ज़िले का कैसा रहा रिपोर्ट कार्ड?

अल्मोड़ा, बागेश्वर, हरिद्वार जैसे ज़िलों में दो महीने बीतने के बावजूद एक रुपया भी विभागों को नहीं दिया गया. पौड़ी, चमोली और उधमसिंह नगर भी फिसड्डी साबित हुए, पौड़ी में तीन, चमोली में पांच और यूएसनगर में मात्र आठ फीसदी धनराशि विभागों को जारी की गई. हालांकि, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़ और चम्पावत ज़िलों का बेहतर प्रदर्शन भी रहा. लेकिन, ज़्यादातर ज़िलों के लचर प्रदर्शन ने विकास की गाड़ी पटरी से उतार दी. हालत ये कि पांच सौ करोड़ खाते में होने के बावजूद दो महीने में मात्र 10 करोड़ रुपए ही खर्च हो पाए. नतीजा जो विकास कार्य होने थे, वो सिफर रह गए.

विकास कार्यों के पिछड़ने पर प्रभारी मंत्री धन सिंह रावत ने खासी नाराज़गी ज़ाहिर की.

​क्या रही ज़िलों के पिछड़ने की वजह?

दरअसल, ज़िला प्लान के लिए विकास योजनाओं का चयन प्रभारी मंत्री की अध्यक्षता में ज़िला योजना समितियां करती हैं. लेकिन, उत्तराखंड में इस बार कोविड के चलते ज़िला योजना समितियां नहीं बनीं. ऐसे में, डीएम और प्रभारी मंत्री को ही योजनाओं को चुनकर उनके लिए धनराशि जारी करने का अधिकार दे दिया गया. लेकिन, प्रभारी मंत्री ज़िलों का दौरा ही नहीं कर पाए. नतीजा न योजनाएं चयनित हो पाई, न पैसा रिलीज हुआ.

क्या कह रहे हैं ज़िम्मेदार?

प्रभारी मंत्रियों, संबंधित अधिकारियों और ज़िम्मेदारों का इस बारे में क्या कहना है, सि​लसिलेवार देखिए.

1. ऐसा नहीं होना था, यह नाराज़ करने वाली बात है कि तमाम विकास कार्य लटके पड़े हैं. — अल्मोड़ा के ज़िला पंचायत सदस्य धन सिंह रावत

2. हरिद्वार में मार्च, अप्रैल में ही पंचायतों का कार्यकाल समाप्त हुआ. यह ऐसा ज़िला है जहां पंचायतें प्रशासकों के हवाले हैं. इसके चलते पैसा रिलीज़ करने में देर हुई. — हरिद्वार के ज़िलाधकारी सी रविशंकर

3. मैंने काफी पहले ही योजनाएं अनुमोदित कर दी थीं, लेकिन पैसा समय पर विभागों को डिलीवर क्यों नहीं हो पाया, इसकी जानकारी नहीं है. — पौड़ी के प्रभारी मंत्री बिशन सिंह चुफाल

4. कोविड के चलते फिज़िकली मीटिंग नहीं हो सकती थी, लेकिन ऑनलाइन योजनाओं को स्वीकृति दे दी थी. मई लास्ट तक पैसा विभागों को रिलीज़ न हो पाना, सवाल नहीं आंकड़ों का झोल है. — अल्मोड़ा के प्रभारी मंत्री हरक सिंह रावत

और क्या कह रहे हैं जानकार?

पौड़ी ज़िेल के द्वारीखाल ब्लॉक के प्रमुख और पंचायती राज व्यवस्था के जानकार महेंद्र सिंह राणा कहते हैं कि ये बड़ी लापरवाही है क्योंकि अब मानसून काल शुरू हो चुका है. बरसात में निर्माण कार्य हो नहीं पाएंगे. उसके बाद करीब दिसंबर में विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लागू हो जाएगी. तो फिर विकास कार्य कब होंगे?

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