उत्तराखंड: जान जोखिम में डाल लकड़ी के लट्ठों पर चलकर नदी पार कर रहे लोग

तकनीक के इस दौर में जहां एक तरफ दुनिया के कई देश समुद्र में शहर बसा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर चीन और नेपाल से सटे सीमांत पिथौरागढ़ जिले के लोग काठ के पुलों से आवाजाही करने के लिए मजबूर हैं। जिले के कई गांवों में बरसात में नदियों के उफान पर आने के कारण काठ के पुल भी बह जाते हैं। ऐसे में लोग या तो देश-दुनिया से अलग-थलग पड़े रहते हैं या फिर किसी दूसरे गांव तक पहुंचने के लिए 15 से 20 किमी की पैदल दूरी तय करनी पड़ती है। 

पिथौरागढ़ जिले की बंगापानी, मुनस्यारी और धारचूला तहसीलों के कई गांव भौगोलिक रूप से दुरूह हैं। वर्ष 1960-70 के दशक में जिला सड़क मार्ग से जुड़ गया था लेकिन 60 से अधिक गांवों तक पहुंचने के लिए नदियों और गधेरों में पैदल पुल तक नहीं बन पाए हैं। जिन गांवों में पहले झूला पुल बने थे, उन्हें नदियां बहा ले गईं। बंगापानी तहसील के घरुड़ी और मनकोट जाने के लिए झूला पुल का निर्माण नहीं किया जा सका है। 

घरुड़ी और मनकोट गांव गोरी नदी के दूसरी ओर बसे हैं। यहां के लोग ट्रॉली के सहारे ही आवागमन करते हैं, लेकिन ट्रॉली भी लगातार साथ नहीं देती है खराब होने या फिर नदी के बहा ले जाने के कारण गांवों का शेष दुनिया से संपर्क कटा रहता है।

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